वास्तु का दिशा विचार

Rajkumar Jain

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प्राकृतिक रूप से चार प्रमुख दिशाएं, चार विदिशाएं तथा ऊध्र्व एवं अधी, इस प्रकार दश दिशाएं मानी जाती हैं। प्रत्येक दिशा का अपना-अपना महत्व एवं गुणधर्म निम्नानुसार हैं :-
 
पूर्व दिशा East:
सूर्योदय की दिशा पूर्व कहलाती है। यह अभ्युदय कारक है। प्रात: काल प्राप्त होने वाली सूर्य रश्मियां मानवीय चेतना में जागृति एवं स्फूर्ति का संचार करती हैं। उत्साह का सवर्धन करती है। मस्तिष्क को तरोताजा बनाती हैं। आयु, आरोग्य में वृद्धि करती हैं। यदि घर के दरवाजे एवं खिड़कियां पूर्वाभिमुखी हों तो निश्चय ही वे सूर्य की समग्र चेतना का घर में सचय करती हैं।
 
उत्तर दिशा North :
उत्तर दिशा का भीं वास्तुशास्त्र की अपेक्षा से बड़ा महत्व माना जाता है। उत्तर दिशा कुबेर की मानी जाती है। इस दिशा में मुख करके विचार करने से शंका का समाधान शीघ्रता से हो जाता है अतएव चिंतन के लिए सामान्यत: उत्तर दिशा की ओर ही मुख रखा जाता है। इसके अतिरिक्त नक्षत्रमंडल में विशिष्ट स्थान रखने वाला ध्रुव तारा सदैव उत्तर दिशा में ही स्थिर रहता है जबकि अन्य तारे दिशा परिवर्तित कर लेते हैं। इस तरह यह दिशा स्थिरता की द्योतक है।
 
कुबेर का वास्तव्य उत्तर में माना जाने से इसे धन संपत्ति दायक माना जाता है। घर के दरवाजे एवं खिड़कियां उत्तर की ओर रहने के कारण घर पर कुबेर की सीधी दृष्टि पड़ने से विपुल धन-धन्य, वैभव तथा आर्थिक सम्पन्नता की प्राप्ति होती है।
 
पूर्व और उत्तर ये दोनों दिशाएं लौकिक तथा पारमार्थिक दृष्टि से ध्यान मनन, चिंतन तथा शुभकार्य एवं वाणिज्य के लिए शुभ एवं लाभदायक होती है।
 
दक्षिण दिशा South :
इस दिशा का स्वामी यम माना जाता है। यम का अर्थ संहारक या नाशक है। दक्षिण का अर्थ विलासिता भी है, इस कारण व्यक्ति मौजमस्ती में उलझकर व्यसनों में पड़ जाता है। तथा अंतत: पतित होता है। आर्थिक, शारीरिक एवं पारिवारिक दृष्टि से वह दुखी रहता है। अतएव इसे अशुभ माना जाता है। इसी कारण मकान में दक्षिण में दरवाजे, खिड़की नहीं रखे जाना चाहिए। कदाचित् दक्षिण दिशा में ज्यादा भार तथा उत्तर एवं पूर्व में कम भार रखने पर संतोष, समृद्धि प्रदाता भी होता है।
 
पश्चिम दिशा West :
पश्चिम दिशा अर्थात् पाश्चात्य या पीछे की दिशा। इसका स्वामी वस्ण माना जाता है। इसका प्रभाव चचल होने से घर, दुकान आदि पश्चिमाभिमुखी होने पर लक्ष्मी चंचल या अस्थिर होती है। इस कारण यह दिशा अपेक्षाकृत कम उपयोगी मानी जाती है।
 
पूर्व और दक्षिण के मध्य आग्नेय दिशा है। इसमें अग्नि तत्व का स्थान माना जाता हैं। दक्षिण और पश्चिम में नैऋत्य दिशा है जिसे नैऋत्य का स्थान माना गया हैं। पश्चिम और उत्तर के मध्य वायव्य दिशा वायु का स्थान मानी गई है। पूर्व एवं उत्तर के मध्य ईशान दिशा है। दोनों शुभ दिशाओं के मध्य होने से इसे ईश्वर तुल्य स्थान माना जाता है।
 
मनुष्य के रहने का निवास, मंदिर, प्रासाद, दुकान, कारखाना, कार्यालय, आदि वास्तु निर्माण करते समय यदि वास्तुशास्त्र के अनुकूल निर्माण कराये जाये तो वे वास्तुएं सुख, समृद्धि, शांत तथा आनंद को प्रदान करने वाली होती हैं।

 


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